Sunday, October 25, 2020
Sunday, May 17, 2015
पानी से पहचान
पानी से मेरी पहचान
तब हुई थी
जब खचपच खचपच
मैने बहाई थी
काग़ज़ की किश्तिया
सवार थी उसमें
मेरी नन्ही गुड़िया
और चिरकु का गुड्डा
दोनो ही खुश थे
दान ना दहेज
बस पाँच बाराती आए
और बस...
हो गई शादी
कपड़ा नई लत्ता नई
गहना नई
बस विदा हो गई डोली
अब तो पिचकू के बापू
पिचकू व्याहनी औूखी
सारा बाज़ार ख़रीदो
पानी में नहीं
सड़क पे दौड़ेगी किश्ती
दान दहेज होगा
कपड़ा लत्ता
गहना गाड़ी होगी
तो उठेगी
डोली
पूरा शहर होगा बाराती
खाएँगे भी
बरसेंगे भी...
पानी की पहचान
तब आँखों से होगी
बरसेगा पानी
छम...छम...छम..
ज़िंदगी भर का दर्द दे जाएगी
पिचकू
- गीता डोगरा
हे ईश्वर
हे ईश्वर
कितना झुकायोगे तुम
इस पुरुष प्रधान
समाज के आगे
मेरी रगों में बहता खून
फड़कने लगता है
जब जब वह समाज
छूने लगता है मेरी देह को
विकृत मन से
और अंधमुंदी आँखें
खुल जाती हैं
उस लौह पुरुष के
बदन की गंध से
तब मैं चीखती हूँ
पर कहाँ रह जाता है
कोई अर्थ
मेरी पीड़ा का, मेरे मन का
जबकि मैं औरत की तरह नहीं
एक बेजान चीज़ की तरह
रौदी जाती हूँ!! हे पुरुष
कहाँ रह जाता है तुम्हारा भी कोई अस्तित्व
जब तुम किसी
हिंसक की तरह झपटते हो मुझ पर....
- गीता डोगरा
वह लड़की
वह लड़की
सीख गई है
अपने ज़ख़्मों को छुपाना
उसने सीख लिया है
दर्द में भी
मुस्कुराना
शहर रोता है जब जब
वह भी कर लेती है
आँख नम....
फिर कुछ चेहरों के बीच
जा मुस्कुराना
उसने चन्द घंटों में ही
शहर के रीति रिवाज
औड़ने का ढंग
फिर शहर - दर शहर
भटकना
फिर वह देती है दस्तक
स्वपन गढ़ती है
पर कितना मुश्किल
होता होगा
सपनों का देहरी पर से
होकर लौट जाना
नहीं तो बस नही
सीख पाई
दरवाज़े पर से
उन सपनों को रोके रखना
इसलिए..
वह हर रोज़
ढूँढती है सबब
बेरोक टोक कहीं जाने के रास्ते
पर नहीं सीख पाई
अपना जीना अपना मरना
वह लड़की....
- गीता डोगरा
Tuesday, August 23, 2011
man jab bahut bhavuk hota hai...to ak ajeeb si udasi cha jati hai....us udasi mein mein nature k kareeb hona chahti hun....lekin....kuch jimedarion se niklna kitna mushkil hai....nature ne mughy maa, patni k sath sath kuch aise kam sounp diye hain k unhe nibhane mein hi maza hai.......udasi ka kaya hai..kuch udas aur kuch khush gazalen sunoongi to theek ho jaoongi...par aj bahut udas hun...kahin kuch ghat gaya hai...aur tut fut mere bhitar ho gayi hai Geeta Dogra, poetess
बातें करना किसे अछा नहीं लगता? पर वो बात कौन सी है जो मन को ख़ुशी दे,
में तो आजकल जहाँ भी जाती हु ऊऊँ लड़कीओ की बात करती हुँ जौ ईस वक़्त पहले न: परहैं जिन्होंने देश ,अपने माता पिता , या शहर का …नाम बड़ा किया है ताकि दसरो मैं यह ख्वाहिश जगऐ उन्को भी बेटी होयह ख़्वाहिश जगे तो में अपने आप कॉ खुशकिस्मत मनुगि…अप भी जहाँ जाएँ ऐसा कारें …समाज बदले ,,,फिर हम रहें या न…हमारी डॉटर अछि रहें
में तो आजकल जहाँ भी जाती हु ऊऊँ लड़कीओ की बात करती हुँ जौ ईस वक़्त पहले न: परहैं जिन्होंने देश ,अपने माता पिता , या शहर का …नाम बड़ा किया है ताकि दसरो मैं यह ख्वाहिश जगऐ उन्को भी बेटी होयह ख़्वाहिश जगे तो में अपने आप कॉ खुशकिस्मत मनुगि…अप भी जहाँ जाएँ ऐसा कारें …समाज बदले ,,,फिर हम रहें या न…हमारी डॉटर अछि रहें
Saturday, December 25, 2010
झील में नहाने दो
चलो एकाध गीत गाने दो
मौसम बदलेगा जब देखा जाएगा
तब तक तो
सपनों की झील में नहाने दो
लिखने दो ख़त प्रेमी को
जो रिझाता है
ऊँगली पकड़ ले जाता है
चाँद तारों से दूर
ख्वाब टूटेंगे जब
तब देखा जाएगा
तब तक तो मन में फूल खिलाने दो
मुस्कराने दो मुझे
भीग जाने दो
मैं मैं रहूँ या नदी हो जाऊं
लहर कभी रुकेगी तो देखा जाएगा
तब तो बह जाने दो निर्विघ्न
झील में नहाने दो
चलो एकाध गीत गाने दो
मौसम बदलेगा जब देखा जाएगा
तब तक तो
सपनों की झील में नहाने दो
लिखने दो ख़त प्रेमी को
जो रिझाता है
ऊँगली पकड़ ले जाता है
चाँद तारों से दूर
ख्वाब टूटेंगे जब
तब देखा जाएगा
तब तक तो मन में फूल खिलाने दो
मुस्कराने दो मुझे
भीग जाने दो
मैं मैं रहूँ या नदी हो जाऊं
लहर कभी रुकेगी तो देखा जाएगा
तब तो बह जाने दो निर्विघ्न
झील में नहाने दो
लड़कियां
बाबा को पसंद नहीं
लड़कियों का
आँगन से बाहर झांकना
उन्हें कतई पसंद नहीं
कि लड़कियां झुण्ड बना
गाँव कि किसी गली में
खड़ी हो
माओं पर हो रहे अत्याचारों की
कथा बुनें
और मर्दों कि नामर्दगी पर
अपनी राय रखें
बाबा कि राय में
लड़कियों का जन्म ही इसीलिए
होता है
कि वे
औलादें जनती रहें
और बीनती रहें जिस्म कि चोटें
धीरज की धरती कि माफिक
सहती रहें - गलत भी ठीक तरह
उन्हें कतई कतई पसंद नहीं
लड़कियों का खिलखिला कर हँसना
और अगर
उन्हें यह महसूस हो कि
लड़कियां बढ़ रही है
अपनी औकात से आगे
तो वे रचना शुरू कर देते हैं
लड़कियों को कुचलने कि साजिश....
बाबा को पसंद नहीं
लड़कियों का
आँगन से बाहर झांकना
उन्हें कतई पसंद नहीं
कि लड़कियां झुण्ड बना
गाँव कि किसी गली में
खड़ी हो
माओं पर हो रहे अत्याचारों की
कथा बुनें
और मर्दों कि नामर्दगी पर
अपनी राय रखें
बाबा कि राय में
लड़कियों का जन्म ही इसीलिए
होता है
कि वे
औलादें जनती रहें
और बीनती रहें जिस्म कि चोटें
धीरज की धरती कि माफिक
सहती रहें - गलत भी ठीक तरह
उन्हें कतई कतई पसंद नहीं
लड़कियों का खिलखिला कर हँसना
और अगर
उन्हें यह महसूस हो कि
लड़कियां बढ़ रही है
अपनी औकात से आगे
तो वे रचना शुरू कर देते हैं
लड़कियों को कुचलने कि साजिश....
रूह की बात
जिस्म जिस्म नहीं होता
जब तक हो न
उसमें रूह शामिल
इसीलिए करती रहती हूँ
बगावत
तुम्हारे साथ हर रात में
मैं नहीं दे पाती
तुम्हारा साथ
छू नहीं पाती तुम्हारा चेहरा
कैक्टस सी लगने लगती है
तुम्हारी छुअन
कभी हलकी, कभी तीखी
पहले
मैं तुमसे हिल मिल गई थी
तब...तुम रच बस न सके
तुम्हारी नींदों में भी
उसका नाम
तब बर्फ की तरह हो जाती थी
मैं अचानक....
फिर
मैं तुम्हारे अतीत को चाहने लगी
उसे लेकर
तुमसे बतियाने लगी
तुम मुस्कराते
मीलों मील चलते
मुझसे बौराते न थे
उसको याद करते
कभी
उस पर झल्लाते
गुस्साए से...मगर
निभाते रहे....उससे
बेनाम रिश्ता
और मैं अनचाहे तुमसे
पर
मैं तुमसे दूर
बहुत दूर निकल गई
अभी भी मेरे भीतर
पलता है वह अपमान
कि
मैं क्यों बनी रही
सालों साल
तुम्हारे ड्राइंग रूम का शो पीस
और क्यों?
बरसों बीत गए
इसी तरह एक छत के नीचे
नहीं छू पाए तुम मेरी रूह
बस...खेलते रहे जिस्मों से
हम
एक दूसरे की जरुरत हो गए
एक साथ रहने की
आदत हो गए!
पर ...
खेल तो खेल होता है
वक़्त आने पर खत्म हो जाता है
जिस तरह
धरती पर आ गिरती है
आकाश को छूने के प्रयास में
बिना छूए गेंद
और ढूँढ लेती है
कोई एक टुकड़ा ज़मीन
पर मैं
गेंद नहीं बनी
तुम्हारे जिस्म से मुक्त हो
मैंने ढूँढ लिया
अपने लिए एक अदद आसमान
छू लिया उसने भी
मुझे...अचानक
और मैंने उसकी नब्ज़ पर
लिख दिया
अपना नाम
जिस्म जिस्म नहीं होता
जब तक हो न
उसमें रूह शामिल
इसीलिए करती रहती हूँ
बगावत
तुम्हारे साथ हर रात में
मैं नहीं दे पाती
तुम्हारा साथ
छू नहीं पाती तुम्हारा चेहरा
कैक्टस सी लगने लगती है
तुम्हारी छुअन
कभी हलकी, कभी तीखी
पहले
मैं तुमसे हिल मिल गई थी
तब...तुम रच बस न सके
तुम्हारी नींदों में भी
उसका नाम
तब बर्फ की तरह हो जाती थी
मैं अचानक....
फिर
मैं तुम्हारे अतीत को चाहने लगी
उसे लेकर
तुमसे बतियाने लगी
तुम मुस्कराते
मीलों मील चलते
मुझसे बौराते न थे
उसको याद करते
कभी
उस पर झल्लाते
गुस्साए से...मगर
निभाते रहे....उससे
बेनाम रिश्ता
और मैं अनचाहे तुमसे
पर
मैं तुमसे दूर
बहुत दूर निकल गई
अभी भी मेरे भीतर
पलता है वह अपमान
कि
मैं क्यों बनी रही
सालों साल
तुम्हारे ड्राइंग रूम का शो पीस
और क्यों?
बरसों बीत गए
इसी तरह एक छत के नीचे
नहीं छू पाए तुम मेरी रूह
बस...खेलते रहे जिस्मों से
हम
एक दूसरे की जरुरत हो गए
एक साथ रहने की
आदत हो गए!
पर ...
खेल तो खेल होता है
वक़्त आने पर खत्म हो जाता है
जिस तरह
धरती पर आ गिरती है
आकाश को छूने के प्रयास में
बिना छूए गेंद
और ढूँढ लेती है
कोई एक टुकड़ा ज़मीन
पर मैं
गेंद नहीं बनी
तुम्हारे जिस्म से मुक्त हो
मैंने ढूँढ लिया
अपने लिए एक अदद आसमान
छू लिया उसने भी
मुझे...अचानक
और मैंने उसकी नब्ज़ पर
लिख दिया
अपना नाम
माँ की मौत की दुआ
हाँ माँ,
मैंने मांगी थी
तुम्हारी मौत की दुआ
तुम जब
उतार दी गई थी जमी पर
और अटक रही
तुम्हारी साँसे
जब जब लौट आती थी
तब तुम्हारे
बर्फ से हाथों को सहलाती
मैं महसूस कर रही थी
की तुम मेरी हथेली पर
लिख कर पूछ रही हो
की...निम्मी!
मुझे क्यों नहीं आती मौत
तब उस शाम
मैं गई थी
दुखभंजनी
और उन सीड़ियों पर
बैठ उस सच्चे पातशाह
से
मैंने तुम्हारी मौत की
दुआ की थी
तब
मुझे लगा था
की
मैं अपनी ही अर्थी
उठा रही हूँ
अपने कंधे पर
और तुम ठीक
मेरे पीछे पीछे
चल रही हो
मेरा ही मातम मानती
मेरे दाह संस्कार पर
हाँ माँ,
मैंने मांगी थी
तुम्हारी मौत की दुआ
तुम जब
उतार दी गई थी जमी पर
और अटक रही
तुम्हारी साँसे
जब जब लौट आती थी
तब तुम्हारे
बर्फ से हाथों को सहलाती
मैं महसूस कर रही थी
की तुम मेरी हथेली पर
लिख कर पूछ रही हो
की...निम्मी!
मुझे क्यों नहीं आती मौत
तब उस शाम
मैं गई थी
दुखभंजनी
और उन सीड़ियों पर
बैठ उस सच्चे पातशाह
से
मैंने तुम्हारी मौत की
दुआ की थी
तब
मुझे लगा था
की
मैं अपनी ही अर्थी
उठा रही हूँ
अपने कंधे पर
और तुम ठीक
मेरे पीछे पीछे
चल रही हो
मेरा ही मातम मानती
मेरे दाह संस्कार पर
Monday, August 23, 2010
आंसू
छोड़ जाओगे तुम
एक दिन
और मैं देहरी पर
खड़ी-खड़ी
पत्थर हो जाउंगी
मेरी आँख का कतरा
अटक जायेगा
मेरी गाल पर
और
जब कभी
तुम लौटोगे
तो उठा न पाओगे
उसे
अपनी ऊँगली पर
न होंठ से ही
तुम्हें न होगा
एहसास
उसके गीलेपन का
वह भी
हो जायेगा
पत्थर मेरे साथ-साथ
एक दिन
और मैं देहरी पर
खड़ी-खड़ी
पत्थर हो जाउंगी
मेरी आँख का कतरा
अटक जायेगा
मेरी गाल पर
और
जब कभी
तुम लौटोगे
तो उठा न पाओगे
उसे
अपनी ऊँगली पर
न होंठ से ही
तुम्हें न होगा
एहसास
उसके गीलेपन का
वह भी
हो जायेगा
पत्थर मेरे साथ-साथ
उम्र
मुझे
कभी-कभी
उम्र भी हैरान
कर जाती है
जानें कब हल्का-सा
छूती है
और सारा वजूद ही
रंग बदलने लगता है
पर रूह नहीं बदलती
वह ढूँढती रहती है
इक ठंडक-सी
प्रेम का राग भी
वह तो जानती तक नहीं
की
उम्र क्या होती है
कब जिस्म छू कर चली जाएगी
ठीक वैसे
जैसे तू और मैं
धूनी रमाये बैठे हैं
कभी-कभी
उम्र भी हैरान
कर जाती है
जानें कब हल्का-सा
छूती है
और सारा वजूद ही
रंग बदलने लगता है
पर रूह नहीं बदलती
वह ढूँढती रहती है
इक ठंडक-सी
प्रेम का राग भी
वह तो जानती तक नहीं
की
उम्र क्या होती है
कब जिस्म छू कर चली जाएगी
ठीक वैसे
जैसे तू और मैं
धूनी रमाये बैठे हैं
मेरी कविता और मैं...
जैसे जैसे मेरी उम्र बढ़ रही है, ऐसे में मेरा मन चाहता है की मैं अपनी कविता के और करीब चली जाऊं। मुझे लगता है की जितना मैंने लिखा है, वह तो काफी नहीं है। बहुत सी बातें हैं, बहुत से अनुभव हैं, जो मुझे लिखने हैं। पर वे कब मेरे कागजों पर उतरेंगे, नहीं जानती। अक्सर आधी रात को सोते सोते मेरे भीतर कोई ख्वाब या कोई एहसास कविता के रूप में दिमाग में दौड़ने लगता है, और मैं चुपचाप मन के अन्दर कविता बनाने लगती हूँ। यही मेरी रचना प्रक्रिया के सबसे खूबसूरत पल होते हैं।
पहली कविता लिखने का कोई फैसला मैंने नहीं लिया था। मेरे भीतर न जाने कैसे शब्दों की एक नदी बहने लगी थी, और मेरी मासूम उम्र उन शब्दों को चुन चुन झोली में भरती रही। कवि होने का यह निर्णय भी न था। पहली तुकबंदी होली के दिन हुई, जब हमारे मोहल्ले में लड़के ढोल पीटते होली का त्यौहार मानते गुज़र रहे थे। मैं तब छठी कक्षा में पढ़ती थी। उन दिनों हम फाजिल्का में रहते थे। पिता पुलिस विभाग में थे। सो, इधर, उधर तबादले के सिलसिले में यहाँ तहां घूम लेते थे। जहाँ मैं पढ़ती थी, वह सरकारी पाठशाला थी, वहां एक पुस्तकालय भी था। मैं अक्सर आधी छुट्टी को वहां जाकर किताबों के नाम देखा करती थी। उन्हें पढ़ नहीं पाती, किताबें बड़ी थी, मैं छोटी सी थी। हाँ, घर में माँ ने हमारे पढने के लिए चंदामामा और एक बाल पत्रिका लगवा रखी थी। खुद वे साहित्य की किताबें लाइब्ररी में पुस्तकें लेने और वापिस करने भी मैं ही जाती, माँ मेरे पुस्तक चयन करने के मामले को लेकर भी बहुत खुश होती थी। मैं अक्सर किताब के पन्ने उलटती-पलटती ही तय कर लेती थी की फलां किताब माँ को पसंद आएगी। मेरा भी मन होता था की मैं उन किताबों को पढूं। पर ऐसा संभव ही कहाँ था? हाँ, वह सारा माहौल मुझे कुछ न कुछ लिखने के लिए प्रेरित जरुर करता, तभी तो मैं छोटी छोटी कवितायेँ लिख पाई। लेकिन आज मुझे एक बात जरुर हैरान करती है की आठवीं तक मैं यही समझ न पाई थी की जो मेरे कागजों पर अनायास ही उतर रहा है, वह मेरा अपना है, खुद का रचा साहित्य। यह एहसास तो बहुत बाद में मुझे हुआ। मैं सहेलियों के साथ कभी खेलने नहीं जाती थी। खेलकूद मुझे अच्छा न लगता था...मुझे किताबों से बहुत लगाव था या अकेलेपन से... माँ मेरी इस बात से कभी तो बहुत खुश हो जाती और कभी उदास भी। मेरी स्कूल के समय में एक ही सहेली थी। कुछ दिनों के बाद उसके पिता का तबादला हो गया और वह भी चली गई। मेरा स्कूल में मन नहीं लगता था। मैंने माँ से मिन्नत की और आठवीं तक पहुँचते स्कूल बदल लिया। मैं अब एस.डी. हाई स्कूल फाजिल्का में आ गई थी। इस स्कूल में आकर मुझे मेरी पसंद की सहेली मिल गई, उसका नाम उषा था। मैंने कहानियां बनानी शुरू कर डी। वे सारी कहानियां मैं उषा को जुबानी सुनाती। उषा बहुत हैरान होती की मैंने इन्हें कब कहाँ पढ़ा तो मैंने एक दिन उसे बताया कि ये सब कहानियां मेरे मन में न जाने कहाँ से उतर आती हैं। फिर उसी ने मुझे कहा कि मैं उन कहानियों और कवितायों को कागजों पर उतरा करूँ। बस, इसे ही मैंने पल्ले बाँध लिया। मुझे सचमुच विस्मय हुआ कि मैं भी दूसरों कि तरह खुद लिख सकती हूँ, पर मैं माँ से बहुत डरती थी, उनको बताने का सहस मैंने कभी नहीं किया था। उन्हें तो बहुत बाद जाकर पता चला कि मैं पढाई कि किताबों के बीच कोरे पन्ने रख कर कवितायें या कहानियां लिखती रही और आठवीं पास करने से पहले मैंने एक उपन्यास भी लिख दिया। जो भी लिखा, पर कविता लिखने से मुझे बहुत सुख मिला। मुझे हमेशा लगा कि जीवन में जो कुछ भी घटता है या आसपास जो मैं महसूस कर सकती हूँ, उसे सहेजने में कविता बहुत काम कि चीज़ है। कविता में रस है, कविता में जीवन है, कविता में विषाद और वेदना है। कविता में चाहें तो सारी सृष्टि समां सकती है। ....और जब आप अकेले छत पर बारिश कि बूंदों को भी भीतर तक समेटना चाहें तो भी कविता को पुकार सकते हैं। मेरी कविता ही मेरी दोस्त बन कर आज तक मेरी उंगली थामे साथ-साथ चल रही है। फिर अन्य किसी दोस्त कि जरुरत ही कहाँ रह जाती है? आप जिस रूप में चाहते हैं, कविता उसी लिबास में आपके समक्ष आ कड़ी होती है। आपके साथ रोटी भी है, खुश भी होती है। कविता सचमुच मेरे लिए प्राण है।
क्रमश....
Monday, July 12, 2010
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है!
मेरे जीने का महत्व लेखन से ही है। इसके बिना मैं खुद को अधूरा महसूस करती हूँ। बेशक मैं हर विधा में लिख सकती हूँ लेकिन कविता मेरे जीवन का मूल मंत्र है। कविता मुझे प्रकृति से जोडती है और उस परमात्मा ने इस प्रकृति में कितनी नेमते बख्शी है, वे सब मेरी कविता का हिस्सा बन जाती है। अगले पड़ाव तक, धुप उदास है और दहलीज़ मेरी काव्य पुस्तके हैं जो मैंने पाठकों को दी हैं। इसके अतिरिक्त मेरी अन्य नौ पुस्तके हैं जिनमें एक उपन्यास 'बंद दरवाज़े' और शेष अलग अलग विधा में हैं।
मैं चाहूंगी की मेरे पाठक और मेरे लेखक मित्र मेरे ब्लॉग पर आकर मुझसे बातचीत करें और अपने विचारों का आदान प्रदान करें। आपका स्वागत है!
गीता डोगरा
मैं चाहूंगी की मेरे पाठक और मेरे लेखक मित्र मेरे ब्लॉग पर आकर मुझसे बातचीत करें और अपने विचारों का आदान प्रदान करें। आपका स्वागत है!
गीता डोगरा
Subscribe to:
Posts (Atom)